वो 4 प्रसिद्ध और बदकिस्मत एथिलीट जिनकी जान खेल के मैदान पर चली गयी

वो 4  प्रसिद्ध और बदकिस्मत एथिलीट जिनकी जान खेल के मैदान पर चली गयी

किसी खेल में अगर जीतना हो तो जुनून जरूरी हैं लेकिन कभी कभी खिलाडी का यही जूनून उसकी जान के लिए जानलेवा बन जाता है. क्रिकेट के मैदान से लेकर कार रेसिंग की दुनिया में ऐसे कई  नाम रहे जिन्होंने खेल में न सिर्फ अपना नाम कमाया बल्कि उसी खेल के मैदान में अपनी आखिरी सांस ली..खेल चाहे कोई भी हो खतरनाक बनने में समय नहीं लगता है.हम बताते हैं ऐसे ही खिलाडियों के बारे में


डेल अर्नहार्ट


कार रेसिंग की दुनिया में नाम कमाने वाले डेल अर्नहार्ट 1951 में नॉर्थ कैरोलिना में जन्में.. इन्होनें अपने पिता की प्रोफेशनल कार रेसिंग की दुनिया में कदम रखा.. 1979 में NASCAR के रूकी ऑफ द ईयर सम्मान प्राप्त करने के बाद, उन्होंने अपने दूसरे सत्र में विंस्टन कप चैंपियनशिप जीती.. 1998 में इन्होंने पहली बार डेटोना 500 जीता, लेकिन उन्हें क्या मालूम था कि जिस खेल में इन्होंने कई बार जीत हासिल की वहीं इनकी जान ले लेगा.. जब बारी 2001 के डेटोना 500 की आई तो डेल अर्नहार्ट ने भाग लिया और उन्होंने अपने से आगे के  दो ड्राइवरों, डेल जूनियर और टीम के साथी माइकल वालट्रिप के साथ रेस शुरू की.. तभी डेल की कार को पीछे से काट दिया गया और जानलेवा बन गई रेसिंग.. इसी दौरान डेल अर्नहार्ट को हास्पिटल में ले जाया गया लेकिन वहीं इनकी मौत हो गई.


हिरोवेज कस्टिक


2018 में विश्व कप सिंड्रेला की कहानी क्रोएशिया क्वार्टरफाइनल में आगे बढ़ी, तो गोलकीपर डैनियल सुबासिक के आँसू नहीं रूकें वो जीतने की खुशी को जाहीर नहीं कर रहे थे बल्कि वो पीड़ित थे अपने मित्र के वियोग में.. हम आपको बात कर रहे है क्रोएशियाई फुटबॉल टीम के गोलकीपर डेनियल सुबासिच की. जिसने अपनी दोस्ती की मिसाल कायम की और अपनी जीत का जश्न ना करते हुए दोस्त और पूर्व टीम के साथी हिवूजे कस्टिक को खोने का शोक मनाया.. संवाददाताओं के साथ बात करते हुए , सुबासिक ने अपनी अपनी भावनाओं को रोक नहीं पाएं . सालों तक उन्होंने अपनी जर्सी के नीचे कस्टिक की एक तस्वीर पहनी थी.. सुबासिक की भावभीनी श्रद्धांजलि के दस साल पहले,  हिरोवेज कस्टिक की एक प्रतिष्ठित उपाधि के साथ मृत्यु हो गई. 2008 में कस्टिक की टीम ज़डार में एक क्रोएशियाई चैम्पियनशिप मैच था.घर की भीड़ के सामने एक गेंद के बाद 24-वर्षीय विंगर फैल गया और एक ठोस दीवार से टकरा गया.. ज़डार मैच जीतने के लिए आगे बढ़े, लेकिन सफलता नहीं मिली.. कॉस्टिक की आपातकालीन सर्जरी हुई लेकिन कभी भी ठीक नहीं हुई."गंभीर मस्तिष्क की चोट" पीड़ित होने के पांच दिन बाद उनकी मौत हो गई.


फ़्ल हाइमन


फ़्ल हाइमन जो एक अमेरिकी एथलीट थी.. जिन्होंने वालीबॉल में एक स्थान बनाया जिसे भूला नहीं जा सकता.अमेरिकी वॉलीबॉल पर हाइमन के प्रभाव ने उन्हें एक आइकन बना दिया.. टीम ने 1964 और 1968 में ओलंपिक में भाग लिया और 1972 में क्वालीफाई नहीं किया.. हाइमन की मदद से अमेरिका ने 1978 विश्व चैंपियनशिप में पांचवां स्थान हासिल किया.अमेरिका ने उन ओलंपिक का बहिष्कार किया , लेकिन हाइमन ने महिला टीम के साथ 1984 में रजत पदक जीता.

जनवरी 1986 में जब हाइमन 31 साल की थी..वह एक लीग में एक जापानी टीम में शामिल हो गई.. लेकिन टोक्यो में एक खेल के दौरान वह बाहर बैठ गई, और अचानक "चुपचाप फर्श पर गिर गई.  उसी दौरान इस दिग्गज खिलाड़ी की मौत हो गई.. पहले तो हाईमन की मौत के बारे में कहा जा रहा था कि हाइमन को दिल का दौरा पड़ा लेकिन शव की जांच से पता चला कि हाइमन को मार्फ़न सिंड्रोम था, जो एक दुर्लभ और लाइलाज बीमारी है जो महाधमनी को नुकसान पहुंचाती है.. हाइमन के दिल में एक दोषपूर्ण आकार का दोष था जिससे उसकी महाधमनी टूट गई और सबक छोड़कर चली गई.

फ्रान क्रिप्पन


26 वर्षीय फ्रान क्रिप्पन के निधन भी उन्हीं के प्रिय खेल तैराकी ने ले ली.. क्या जानता कि आपका सपना ही उनकी मौत का कारण बन जा जाएगा लेकिन हुआ तो कुछ ऐसा ही फ्रान क्रिप्पन भी शिकार बन गए.

क्रिप्पन की दृढ़ता ने उनके जीवन में अनगिनत बार भुगतान किया.. वह कॉलेज में 11 बार ऑल-अमेरिकन और साल में दो बार तैराक रहे थे.वह 2009 के राष्ट्रीय चैंपियन थे और उन्होंने तैराकी की कई प्रतियोगिताओं में स्वर्ण, रजत और कांस्य पदक जीते थे.लेकिन अक्टूबर 2010 में क्रिप्पन के कभी न छोड़ने वाले रवैये ने उनकी जान ले ली.

दुबई में FINA  ओपन वाटर 10 किलोमीटर में उन्होंने 100 डिग्री के दिन लगभग 90 डिग्री पानी में दौड़ लगाई .क्रिप्पन ने अपने कोच को सूचित किया कि अच्छा महसूस नहीं कर रहे थे,  लेकिन उन्होंने जारी रखने के लिए खुद को धक्का दिया.. और गर्मी की वजह से वो डूब गए और उनकी मौत का कारण भी उन्हीं का पैशन बन गया.

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भारत के इस महान हॉकी खिलाड़ी को मैदान पर देखकर ही पाकिस्तान के खिलाड़ियों को लूजमोशन हो जाते थे, संघर्ष की अनोखी कहानी

संदीप सिंह की जीवनी, संदीप सिंह आज किसी पहचान के मोहताज नहीं है. इन्होंने अपनी मेहनत को उस मुकाम तक पहुंचाया जिससे ये हॉकी को लेकर भारत में ही नहीं बल्कि विश्व में प्रसिद्ध हो गए. कुछ पाना बहुत आसान नहीं होता संदीप का जीवन भी कुछ ऐसा ही रहा. इन्हें जीत आसानी से नहीं मिली लेकिन वह कुछ अलग तरह के खिलाड़ी निकले क्योकि इन्हें संघर्ष हॉकी में आने से पहले कम करना पड़ा बल्कि हॉकी में जाने के बाद ज्यादा संघर्ष किया मानों जैसे इनका जीवन ही पलट गया हो.

आइए आपको बता दें कि आखिर संदीप सिंह का जीवन किस तरह के संघर्ष में रहा. जो इनके ऊपर फिल्म तक बन गई जी हां हम बात कर रहे है उन्हीं संदीप सिंह की जिनकी बायोग्राफी सुरमा काफी हिट रही.


Sandeep singh biography in hindi


संदीप सिंह हरियाणा के जाट परिवार से हैं. इनके भाई हॉकी के बहुत अच्छे खिलाड़ी रहे जिन्होंने उन्हें शिक्षित करके एक अच्छा खिलाड़ी बना दिया. जनवरी 2004 में कुआलालंपुर में संदीप ने सुल्तान अजलान शाह कप से अंतरराष्ट्रीय करियर की शुरुआत की. उसी के साथ इन्होंने एथेंस ग्रीस में आयोजित ग्रीष्मकालीन ओलंपिक में किया. 2004 में हुए जूनियर एशिया कप हॉकी में यह बड़े स्कॉलर रहे और भारत को खिताब दिलाने में बड़ी भूमिका निभाई. अच्छी कामयाबी और मेहनत से इन्हें 2006 के वर्ल्ड कप के लिए चुना गया.

यहां तक संदीप मशहूर जरूर थे लेकिन विश्व में मशहूर तब हुए जब इनकी जिंदगी में वह मनहूस दिन आया. जिस दिन ने इन्हें तोड़ कर रख दिया. और  वह दिन था 22 अगस्त 2006.


हॉकी प्लयेर संदीप सिंह की कहानी | संदीप सिंह का जीवन

2006 के वर्ल्ड कप में जाने के लिए संदीप सिंह शताब्दी एक्सप्रेस में बैठे थे उन्हें क्या पता था कि इस वर्ल्डकप में जाने के लिए जो सपने देख रहे हैं. वो चूर-चूर हो जाएगा.  हुआ यह कि एक पुलिसकर्मी की बंदूक से गोली चली जो सीधे जाकर संदीप के पैर में जा लगी. जिससे यह पैरालाइज हो गए अब क्या था होनी को कौन टाल सकता है.

इस हादसे ने संदीप के सपनों पूरी तरह से तोड़ दिया पूरे 1 साल तक ये व्हीलचेयर पर बैठने के लिए मजबूर हो गए. लेकिन संदीप ने हिम्मत नहीं हारी और हौसले को बुलंद रखा. जो हॉकी इनकी जान थी उसी हॉकी से इन्होंने धीरे-धीरे खड़े होने की कोशिश की और करीब 6 महीने की स्पेशल ट्रीटमेंट से संदीप ना केवल खड़े हो पाए बल्कि तैयार हो गए फिर से हॉकी के मैदान में जाने के लिए.

इस तरह इन्होंने फिर से एक नई जिंदगी शुरू की और 2008 का सुल्तान अजलान शाह कप के साथ एक बिंदास तरीके से वापसी की. जिसके बाद संदीप हर अखबार की हैडलाइन बन गए. सुल्तान अजलान शाह कप में 8 गोल करके संदीप सिंह कमबैक के साथ दुनिया में मशहूर हो गए.

इनकी बेबाक और बिंदास तरीके को देखते हुए पाकिस्तान के कोच ने कह दिया कि तुम ऐसे कैसे खेलते हो कि हमारे खिलाड़ियों को तुम्हें देखकर लूजमोशन हो जाते हैं.

2009 में इंडियन हॉकी टीम के कप्तान बने और कप्तानी में भी इन्होंने भारत को नई जीत दिलाई. इनकी कप्तानी ने 13 साल बाद भारत ने अजलान शाह कप जीता. साथ ही इन्होंने 145  किलो मीटर की रफ्तार से ड्रैग फिक्ल करने का वर्ल्ड रिकॉर्ड भी बनाया. 2012 में लंदन ओलंपिक के लिए क्वालीफाइंग टूर्नामेंट में सबसे ज्यादा 16 गोल का स्कोर करने वाले खिलाड़ी भी संदीप सिंह ही है.

आपको बता दें कि 2010 में भारत सरकार की तरफ से इन्हें अर्जुन अवार्ड दिया गया. इस तरह से संदीप ने पैरालाइज से लड़कर नया मुकाम हासिल किया और आज भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया में जाने-माने नंबर वन हॉकी खिलाड़ी बन गए. इस तरह से संदीप सिंह के जीवन की संघर्ष भरी कहानी जिससे हमें सीखना चाहिए कि मुश्किलें कितनी भी हो मंजिलों को नहीं छोड़ना चाहिए.

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दर्द भरी कहानी- ढाबे पर दूसरों के झूठे बर्तन धोता था ये भारतीय खिलाड़ी, अब विराट कोहली से मिलकर टीम इण्डिया के लिए बस खेलना चाहता है

संघर्ष करके अगर कोई खिलाड़ी किसी मुकाम पर पहुंचता है तो निश्चित रूप से यह कहानी पूरे समाज के लिए एक मिसाल बन जाती है. आपको बता दें कि कई बार हमारे सामने इस तरीके की परिस्थितियां होती हैं कि हमें उनके आगे या तो समर्पण करना पड़ता है या फिर उनसे संघर्ष करना पड़ता है. जो लोग संघर्ष करते हैं वह लोग दूसरों से अलग इतिहास रचते हुए नजर आ सकते हैं. आज हम आपको एक ऐसे ही भारतीय खिलाड़ी की कहानी बताने वाले हैं जो एक समय अपनी गरीबी से तंग आकर ढाबे पर दूसरे लोगों के झूठे बर्तन साफ करने पर मजबूर हो गया था. दूसरों के झूठे बर्तन धोया करता था ये भारतीय खिलाड़ी लेकिन इस खिलाड़ी ने कभी हार नहीं मानी क्योंकि इसके सपने काफी ऊंचे हुआ करते थे. इस भारतीय खिलाड़ी का सपना विराट कोहली से मिलकर इंडियन टीम के लिए खेलने का है. तो आइए आपको बताते हैं कि वह खिलाड़ी कौन है जो कभी ढाबे के ऊपर दूसरे लोगों के झूठे बर्तन साफ किया करता था- दूसरों के झूठे बर्तन धोया करता था ये भारतीय खिलाड़ी भूखे पेट सोई, झूठे बर्तन साफ़ किये अब टीम इण्डिया के लिए खेल रही हैं भारतीय कबड्डी महिला टीम की खिलाड़ी कविता ठाकुर ने काफी संघर्ष करके इंडियन टीम में जगह बनाई है. इस महिला खिलाड़ी की कहानी निश्चित रूप से हम सभी के लिए एक सकारात्मक कहानी बन सकती है. कविता एशियन गेम 2018 में हिस्सा लेने भारतीय महिला कबड्डी टीम के साथ गई हुई है. हिमाचल के मनाली में इनका जन्म हुआ और वहीं पर जैसे तैसे गरीबी में उनका गुजारा हो रहा था. दूसरों के झूठे बर्तन धोया करता था ये भारतीय खिलाड़ी परिवार की स्थिति सही नहीं थी और दो वक्त की रोटी का भी जुगाड़ नहीं हो पा रहा था. यही कारण है कि कविता ठाकुर सड़क के किनारे एक बने हुए ढाबे पर काम किया करती थी और वहां पर झूठे बर्तन साफ करके जैसे तैसे अपना गुजारा कर रही थी. कविता ठाकुर इस साल एशियन गेम्स में टीम इंडिया को जीताने का सपना देख रही हैं. 2007 में कविता ने कबड्डी खेलना शुरू किया था और 2014 में एशियाड के अंदर सभी की इनके ऊपर नजर गई थी. कविता गोल्ड जीतने वाली उस समय पहली भारतीय महिला कबड्डी प्लेयर बनी थीं. आज भी कविता अपने परिवार के साथ एक किराए के मकान में रहती हैं लेकिन इनका सपना है कि वह भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली से मिलकर अपने खेल के ऊपर टिप्स लेना चाहती हैं. शायद इन खिलाड़ियों की मदद के लिए भारतीय खेल मंत्रालय को आगे आना चाहिए और इनको सुख सुविधा मिलनी चाहिए जैसे कि देश में नेताओं को मिलती हैं. आपको कविता की कहानी अच्छी लगे तो इसको शेयर जरूर करें.

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फीफा विश्वकप 2018 की विजेता फ़्रांस को मिले इतने 260 करोड़ रुपैय, तो उप-विजेता क्रोएशिया को भी मिली है बहुत ज्यादा बड़ी रकम

15 जुलाई(रविवार) को एक महीनें से चले आ रहे फीफा वर्ल्ड कप 2018 का सफल समापन हुआ. फाइनल मुकाबले में फ्रांस ने रूस की राजधानी मॉस्को के लुज्निकी स्टेडियम में खेले गए मुकाबले में क्रोएशिया को एक बेहद रोमांचक मुकाबले में 4-2 से हराकर खिताब अपने नाम किया. फुटबॉल का खेल दुनिया में सबसे ज्यादा पसंद जाने वाला खेल हैं. ऐसे में फीफा वर्ल्डकप का आयोजन करने करने वाले अधिकारी इस टूर्नामेंट में हिस्सा लेनी वाली टीमो पर जमकर पैसे की बारिश करते हैं. फ्रांस के चैंपियन बनाने के बाद फैन्स के मन भी प्रश्न उठ रहा होगा कि आखिर फीफा वर्ल्डकप जीतने वाली टीम को इनाम के रूप में कितनी राशी दी जाती हैं. इस लेख में हम फैन्स के इन्ही प्रश्नों का जवाब देगे. फीफा विश्वकप 2018 फीफा वर्ल्डकप 2018 चैंपियन बनने वाली फ्रांस टीम को इनाम राशी के रूप में 38 मिलियन डॉलर(लगभग 260 करोड़ रूपए) दिए गए. इसके आलावा फाइनल में हारने वाली उपविजेता क्रोएशिया को 28 मिलियन डॉलर (लगभग 191 करोड़ रूपए) दिए गए. फीफा विश्वकप 2018 इंग्लैंड को हराने के बाद टूर्नामेंट में नंबर 3 पर रहने वाली बेल्जियम को इनाम के रूप में करीब 164 करोड़ रूपए दिए गए. जबकि क्वार्टरफाइनल में हारने वाली उरुग्वे, ब्राजील, स्वीडन और रूस टीम को इनाम राशी के रूप में 110-110 करोड़ रूपए दिए गए. प्रमुख 16 में जगह बनाने के बाद हारने वाली टीमो को भी इनाम के रूप में 82-82 करोड़ रूपए दिए गए. फीफा विश्वकप 2018 इन सब के आलावा ग्रुप स्टेज से बाहर होने वाली प्रत्येक टीम को करीबन 55-55 करोड़ रूपए दिए हैं. फीफा वर्ल्डकप 2018 के दौरान इनाम राशी के रूप में लगभग 400 मिलियन डॉलर (करीबन करीबन 2700 करोड़ रूपए) बांटे गए. यह एक ऐसा आंकड़ा हैं, जिस पर शायद यकीन करना आसान नहीं हैं, लेकिन यह सच हैं.   

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